Saturday, March 31, 2012


वो 'नूर' से...... बैठे ज़रा कुछ दूर से थे..
फासला महज़ १ शुरुआत भर था पर
वो अपने अहम् में चूर से थे तो
हम भी अपनी खुदगर्जी में, मशहूर से थे...

कुछ गला साफ़ कर , हर बार १ फुसफुसाहट को हवा के बहाने भेजा करते थे
पर तौबा ए किस्मत हमारी...
वो अपनी झुल्फो में जैसे, पेशे से, मगरूर से थे.

१ उमर गुज़र गई इज़हार की इस रस्म अदाई में
बीत गया वो  रमजान, छूट गए हम..., जो गुरुर में थे...
अब सोचते हैं आखिर..
मुह्हब्बत की ये किस नासूर इभारत के हम सूरूर में थे....!!!

-
प्रियांशु वैद्य

Wednesday, February 29, 2012

..!

तब्दीर के आईने में अपनी तस्वीर पर गुमान न करना..
ऐसे में अक्सर तकदीर मार जाती है..!

और हर फूल से न करना दीदार इतना..
काटें तो महज़ चुभा करते है, फूल मार जाते है..!

किसी को तो रास आती है बद्दुआए भी दोस्तों की..
तो किसी को अपनों की दुआए मार जाती है...!
और १ बात; खटाई अंगूर की हो तो शबाब बन जाती है..
पर खटाई अपनों के खूनो में पड़ जाए तो रिश्ते मार जाती है..!
हम आप तो महज १ सिर वाले है..
अपनों की खताए तो १० सिर वालो को भी मार जाती है..!

कुछ पर्दा नशीं की अदाए मार जाती है..
तो शजर से टूटे पत्तो को हर मौसम की हवाए मार जाती है..!
जहा स्याही की बोतले भी खता समझा न पाति..
अश्को की चंद बुँदे मार जाती है..!

तमाशे लाख बरपे सब झेल गए..
पर तमाशबीनो की फुसफुसाती आखें मार जाती है..!
देखता हु खपते आँख वालो को खिदमत्कारी में..
तो आंधो के गलियारों की चमक मार जाती है..!

और आदमी की उम्र लिहाज़ा हाथी की तरह है..
अक्सर हाथी तो निकल जाता है आखिर की पूछ की फजीहत मार जाती है..!

मनघडंत हो बातें तो अविश्वास ही लाती है...
और 'मनमोहन' हो कोई तो 'देश' मार जाती है....!!

-प्रियांशु वैद्य .